Chalisa – Hrelate Astrology https://hrelate.com/astrology Tue, 15 May 2018 08:56:04 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=5.3.26 Sai Chalisa in Hindi: बाबा को मन से याद करो और सारे संकट दूर करो https://hrelate.com/astrology/sai-chalisa-in-hindi/ https://hrelate.com/astrology/sai-chalisa-in-hindi/#respond Thu, 02 Nov 2017 08:34:36 +0000 https://hrelate.com/astrology/?p=16625 साई बाबा एक भारतीय गुरु है। साई बाबा को हिन्दू और मुस्लिम धर्म दोनों संप्रदाय के सभी लोग पूजते है। साई बाबा के सभी भक्त उनको संत, फ़क़ीर, सद्गुरु और ब्रह्माण्ड नायक इन सभी...

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साई बाबा एक भारतीय गुरु है। साई बाबा को हिन्दू और मुस्लिम धर्म दोनों संप्रदाय के सभी लोग पूजते है। साई बाबा के सभी भक्त उनको संत, फ़क़ीर, सद्गुरु और ब्रह्माण्ड नायक इन सभी नामों से पुकारते है।

साई बाबा ने अपना सारा जीवन मानव कल्याण के कार्य लिए व्यतीत किया था। साई बाबा की किसी एक समाज में प्रतिष्ठा नही है। उन्होंने अपने आप को एक सच्चे सद्गुरु को समर्पित कर दिया था। इसलिए सभी लोग उन्हें भगवान का अवतार समझते थे।

साई बाबा की मृत्यु के बाद आज भी हिन्दू और मुस्लिम धर्म के लोग उन्हें पूजते है। कहते है इस संसार में जिसका कोई भी नहीं होता है, उनके लिए साई बाबा होते है। जब भी इंसान किसी भी प्रकार के दुःख, दर्द और परेशानी में रहता है। तो उस इंसान के सभी दुःखो को बाबा दूर कर देते है।

जो भी भक्त बाबा की शरण में जाता है। वो इंसान बाबा के दर से खाली हाथ नहीं लौटता है। भक्त कही पर भी हो बस साई को सच्चे मन से याद करे तो बाबा उसकी पुकार को सुन के उसके सभी संकटों को दूर कर देते है। तो चलिए आज के लेख में जानते है Sai Chalisa in Hindi.

Sai Chalisa in Hindi – साईं बाबा को प्रसन्न करने के लिए पढ़े

Sai Chalisa

श्री साँई चालीसा

पहले सांई के चरणों में, अपना शीश नमाऊं मैं।
कैसे शिरडी साईं आए, सारा हाल सुनाऊं मैं॥1॥

कौन है माता, पिता कौन है, ये न किसी ने भी जाना।
कहां जन्म साईं ने धारा, प्रश्न पहेली रहा बना॥2॥

कोई कहे अयोध्या के, ये रामचंद्र भगवान हैं।
कोई कहता साईं बाबा, पवन पुत्र हनुमान हैं॥3॥

कोई कहता मंगल मूर्ति, श्री गजानंद हैं साईं।
कोई कहता गोकुल मोहन, देवकी नंदन हैं साईं॥4॥

शंकर समझे भक्त कई तो, बाबा को भजते रहते।
कोई कह अवतार दत्त का, पूजा साईं की करते॥5॥

कुछ भी मानो उनको तुम, पर साईं हैं सच्चे भगवान।
बड़े दयालु दीनबंधु, कितनों को दिया जीवन दान॥6॥

कई वर्ष पहले की घटना, तुम्हें सुनाऊंगा मैं बात।
किसी भाग्यशाली की, शिरडी में आई थी बारात॥7॥

आया साथ उसी के था, बालक एक बहुत सुंदर।
आया, आकर वहीं बस गया, पावन शिरडी किया नगर॥8॥

कई दिनों तक भटकता, भिक्षा मांग उसने दर-दर।
और दिखाई ऐसी लीला, जग में जो हो गई अमर॥9॥

जैसे-जैसे उमर बढ़ी, बढ़ती ही वैसे गई शान।
घर-घर होने लगा नगर में, साईं बाबा का गुणगान॥10॥

दिग दिगंत में लगा गूंजने, फिर तो साईं जी का नाम।
दीन-दुखी की रक्षा करना, यही रहा बाबा का काम॥11॥

बाबा के चरणों में जाकर, जो कहता मैं हूं निर्धन।
दया उसी पर होती उनकी, खुल जाते दुख के बंधन॥12॥

कभी किसी ने मांगी भिक्षा, दो बाबा मुझको संतान।
एवमस्तु तब कहकर साईं, देते थे उसको वरदान॥13॥

स्वयं दुखी बाबा हो जाते, दीन-दुखीजन का लख हाल।
अंत:करण श्री साईं का, सागर जैसा रहा विशाल॥14॥

भक्त एक मद्रासी आया, घर का बहुत बड़ा धनवान।
माल खजाना बेहद उसका, केवल नहीं रही संतान॥15॥

लगा मनाने साईंनाथ को, बाबा मुझ पर दया करो।
झंझा से झंकृत नैया को, तुम्हीं मेरी पार करो॥16॥

कुलदीपक के बिना अंधेरा, छाया हुआ घर में मेरे।
इसलिए आया हूं बाबा, होकर शरणागत तेरे॥17॥

कुलदीपक के अभाव में, व्यर्थ है दौलत की माया।
आज भिखारी बनकर बाबा, शरण तुम्हारी मैं आया॥18॥

दे-दो मुझको पुत्र-दान, मैं ऋणी रहूंगा जीवन भर।
और किसी की आशा न मुझको, सिर्फ भरोसा है तुम पर॥19॥

अनुनय-विनय बहुत की उसने, चरणों में धर के शीश।
तब प्रसन्न होकर बाबा ने, दिया भक्त को यह आशीष॥20॥

‘अल्ला भला करेगा तेरा’ पुत्र जन्म हो तेरे घर।
कृपा रहेगी तुझ पर उसकी, और तेरे उस बालक पर॥21॥

अब तक नहीं किसी ने पाया, साईं की कृपा का पार।
पुत्र रत्न दे मद्रासी को, धन्य किया उसका संसार॥22॥

तन-मन से जो भजे उसी का, जग में होता है उद्धार।
सांच को आंच नहीं हैं कोई, सदा झूठ की होती हार॥23॥

मैं हूं सदा सहारे उसके, सदा रहूंगा उसका दास।
साईं जैसा प्रभु मिला है, इतनी ही कम है क्या आस॥24॥

मेरा भी दिन था एक ऐसा, मिलती नहीं मुझे रोटी।
तन पर कपड़ा दूर रहा था, शेष रही नन्हीं सी लंगोटी॥25॥

सरिता सन्मुख होने पर भी, मैं प्यासा का प्यासा था।
दुर्दिन मेरा मेरे ऊपर, दावाग्नी बरसाता था॥26॥

धरती के अतिरिक्त जगत में, मेरा कुछ अवलंब न था।
बना भिखारी मैं दुनिया में, दर-दर ठोकर खाता था॥27॥

ऐसे में एक मित्र मिला जो, परम भक्त साईं का था।
जंजालों से मुक्त मगर, जगत में वह भी मुझसा था॥28॥

बाबा के दर्शन की खातिर, मिल दोनों ने किया विचार।
साईं जैसे दया मूर्ति के, दर्शन को हो गए तैयार॥29॥

पावन शिरडी नगर में जाकर, देख मतवाली मूरति।
धन्य जन्म हो गया कि हमने, जब देखी साईं की सूरति॥30॥

जब से किए हैं दर्शन हमने, दुख सारा काफूर हो गया।
संकट सारे मिटै और, विपदाओं का अंत हो गया॥31॥

मान और सम्मान मिला, भिक्षा में हमको बाबा से।
प्रतिबिंबित हो उठे जगत में, हम साईं की आभा से॥32॥

बाबा ने सन्मान दिया है, मान दिया इस जीवन में।
इसका ही संबल ले मैं, हंसता जाऊंगा जीवन में॥33॥

साईं की लीला का मेरे, मन पर ऐसा असर हुआ।
लगता जगती के कण-कण में, जैसे हो वह भरा हुआ॥34॥

‘काशीराम’ बाबा का भक्त, शिरडी में रहता था।
मैं साईं का साईं मेरा, वह दुनिया से कहता था॥35॥

सीकर स्वयं वस्त्र बेचता, ग्राम-नगर बाजारों में।
झंकृत उसकी हृदय तंत्री थी, साईं की झंकारों में॥36॥

स्तब्ध निशा थी, थे सोए, रजनी आंचल में चांद सितारे।
नहीं सूझता रहा हाथ को हाथ तिमिर के मारे॥37॥

वस्त्र बेचकर लौट रहा था, हाय! हाट से काशी।
विचित्र बड़ा संयोग कि उस दिन, आता था एकाकी॥38॥

घेर राह में खड़े हो गए, उसे कुटिल अन्यायी।
मारो काटो लूटो इसकी ही, ध्वनि पड़ी सुनाई॥39॥

लूट पीटकर उसे वहां से कुटिल गए चम्पत हो।
आघातों में मर्माहत हो, उसने दी संज्ञा खो॥40॥

बहुत देर तक पड़ा रहा वह, वहीं उसी हालत में।
जाने कब कुछ होश हो उठा, वहीं उसकी पलक में॥41॥

अनजाने ही उसके मुंह से, निकल पड़ा था साईं।
जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में, बाबा को पड़ी सुनाई॥42॥

क्षुब्ध हो उठा मानस उनका, बाबा गए विकल हो।
लगता जैसे घटना सारी, घटी उन्हीं के सन्मुख हो॥43॥

उन्मादी से इधर-उधर तब, बाबा लेगे भटकने।
सन्मुख चीजें जो भी आई, उनको लगने पटकने॥44॥

और धधकते अंगारों में, बाबा ने अपना कर डाला।
हुए सशंकित सभी वहां, लख तांडवनृत्य निराला॥45॥

समझ गए सब लोग, कि कोई भक्त पड़ा संकट में।
क्षुभित खड़े थे सभी वहां, पर पड़े हुए विस्मय में॥46॥

उसे बचाने की ही खातिर, बाबा आज विकल है।
उसकी ही पीड़ा से पीड़‍ित, उनकी अंत:स्थल है॥47॥

इतने में ही विविध ने अपनी, विचित्रता दिखलाई।
लख कर जिसको जनता की, श्रद्धा सरिता लहराई॥48॥

लेकर संज्ञाहीन भक्त को, गाड़ी एक वहां आई।
सन्मुख अपने देख भक्त को, साईं की आंखें भर आई॥49॥

शांत, धीर, गंभीर, सिंधु-सा, बाबा का अंत:स्थल।
आज न जाने क्यों रह-रहकर, हो जाता था चंचल॥50॥

आज दया की मूर्ति स्वयं था, बना हुआ उपचारी।
और भक्त के लिए आज था, देव बना प्रतिहारी॥51॥

आज भक्त की विषम परीक्षा में, सफल हुआ था काशी।
उसके ही दर्शन की खातिर थे, उमड़े नगर-निवासी॥52॥

जब भी और जहां भी कोई, भक्त पड़े संकट में।
उसकी रक्षा करने बाबा, आते हैं पलभर में॥54॥

युग-युग का है सत्य यह, नहीं कोई नई कहानी।
आपद्‍ग्रस्त भक्त जब होता, जाते खुद अंर्तयामी॥55॥

भेदभाव से परे पुजारी, मानवता के थे साईं।
जितने प्यारे हिन्दू-मुस्लिम, उतने ही थे सिक्ख ईसाई॥56॥

भेद-भाव मंदिर-मिस्जद का, तोड़-फोड़ बाबा ने डाला।
राह रहीम सभी उनके थे, कृष्ण करीम अल्लाताला॥57॥

घंटे की प्रतिध्वनि से गूंजा, मस्जिद का कोना-कोना।
मिले परस्पर हिन्दू-मुस्लिम, प्यार बढ़ा दिन-दिन दूना॥58॥

चमत्कार था कितना सुंदर, परिचय इस काया ने दी।
और नीम कडुवाहट में भी, मिठास बाबा ने भर दी॥59॥

सब को स्नेह दिया साईं ने, सबको संतुल प्यार किया।
जो कुछ जिसने भी चाहा, बाबा ने उसको वही दिया॥60॥

ऐसे स्नेहशील भाजन का, नाम सदा जो जपा करे।
पर्वत जैसा दुख न क्यों हो, पलभर में वह दूर टरे॥61॥

साईं जैसा दाता हमने, अरे नहीं देखा कोई।
जिसके केवल दर्शन से ही, सारी विपदा दूर गई॥62॥

तन में साईं, मन में साईं, साईं-साईं भजा करो।
अपने तन की सुधि-बुधि खोकर, सुधि उसकी तुम किया करो॥63॥

जब तू अपनी सुधि तज, बाबा की सुधि किया करेगा।
और रात-दिन बाबा-बाबा, ही तू रटा करेगा॥64॥

तो बाबा को अरे! विवश हो, सुधि तेरी लेनी ही होगी।
तेरी हर इच्छा बाबा को पूरी ही करनी होगी॥65॥

जंगल, जंगल भटक न पागल, और ढूंढ़ने बाबा को।
एक जगह केवल शिरडी में, तू पाएगा बाबा को॥66॥

धन्य जगत में प्राणी है वह, जिसने बाबा को पाया।
दुख में, सुख में प्रहर आठ हो, साईं का ही गुण गाया॥67॥

गिरे संकटों के पर्वत, चाहे बिजली ही टूट पड़े।
साईं का ले नाम सदा तुम, सन्मुख सबके रहो अड़े॥68॥

इस बूढ़े की सुन करामत, तुम हो जाओगे हैरान।
दंग रह गए सुनकर जिसको, जाने कितने चतुर सुजान॥69॥

एक बार शिरडी में साधु, ढ़ोंगी था कोई आया।
भोली-भाली नगर-निवासी, जनता को था भरमाया॥70॥

जड़ी-बूटियां उन्हें दिखाकर, करने लगा वह भाषण।
कहने लगा सुनो श्रोतागण, घर मेरा है वृन्दावन॥71॥

औषधि मेरे पास एक है, और अजब इसमें शक्ति।
इसके सेवन करने से ही, हो जाती दुख से मुक्ति॥72॥

अगर मुक्त होना चाहो, तुम संकट से बीमारी से।
तो है मेरा नम्र निवेदन, हर नर से, हर नारी से॥73॥

लो खरीद तुम इसको, इसकी सेवन विधियां हैं न्यारी।
यद्यपि तुच्छ वस्तु है यह, गुण उसके हैं अति भारी॥74॥

जो है संतति हीन यहां यदि, मेरी औषधि को खाए।
पुत्र-रत्न हो प्राप्त, अरे वह मुंह मांगा फल पाए॥75॥

औषधि मेरी जो न खरीदे, जीवन भर पछताएगा।
मुझ जैसा प्राणी शायद ही, अरे यहां आ पाएगा॥76॥

दुनिया दो दिनों का मेला है, मौज शौक तुम भी कर लो।
अगर इससे मिलता है, सब कुछ, तुम भी इसको ले लो॥77॥

हैरानी बढ़ती जनता की, देख इसकी कारस्तानी।
प्रमुदित वह भी मन ही मन था, देख लोगों की नादानी॥78॥

खबर सुनाने बाबा को यह, गया दौड़कर सेवक एक।
सुनकर भृकुटी तनी और, विस्मरण हो गया सभी विवेक॥79॥

हुक्म दिया सेवक को, सत्वर पकड़ दुष्ट को लाओ।
या शिरडी की सीमा से, कपटी को दूर भगाओ॥80॥

मेरे रहते भोली-भाली, शिरडी की जनता को।
कौन नीच ऐसा जो, साहस करता है छलने को॥81॥

पलभर में ऐसे ढोंगी, कपटी नीच लुटेरे को।
महानाश के महागर्त में पहुंचा, दूं जीवन भर को॥82॥

तनिक मिला आभास मदारी, क्रूर, कुटिल अन्यायी को।
काल नाचता है अब सिर पर, गुस्सा आया साईं को॥83॥

पलभर में सब खेल बंद कर, भागा सिर पर रखकर पैर।
सोच रहा था मन ही मन, भगवान नहीं है अब खैर॥84॥

सच है साईं जैसा दानी, मिल न सकेगा जग में।
अंश ईश का साईं बाबा, उन्हें न कुछ भी मुश्किल जग में॥85॥

स्नेह, शील, सौजन्य आदि का, आभूषण धारण कर।
बढ़ता इस दुनिया में जो भी, मानव सेवा के पथ पर॥86॥

वही जीत लेता है जगत के, जन जन का अंत:स्थल।
उसकी एक उदासी ही, जग को कर देती है विहल॥87॥

जब-जब जग में भार पाप का, बढ़-बढ़ ही जाता है।
उसे मिटाने की ही खातिर, अवतारी ही आता है॥88॥

पाप और अन्याय सभी कुछ, इस जगती का हर के।
दूर भगा देता दुनिया के, दानव को क्षण भर के॥89॥

ऐसे ही अवतारी साईं, मृत्युलोक में आकर।
समता का यह पाठ पढ़ाया, सबको अपना आप मिटाकर॥90॥

नाम द्वारका मस्जिद का, रखा शिरडी में साईं ने।
दाप, ताप, संताप मिटाया, जो कुछ आया साईं ने॥91॥

सदा याद में मस्त राम की, बैठे रहते थे साईं।
पहर आठ ही राम नाम को, भजते रहते थे साईं॥92॥

सूखी-रूखी ताजी बासी, चाहे या होवे पकवान।
सौदा प्यार के भूखे साईं की, खातिर थे सभी समान॥93॥

स्नेह और श्रद्धा से अपनी, जन जो कुछ दे जाते थे।
बड़े चाव से उस भोजन को, बाबा पावन करते थे॥94॥

कभी-कभी मन बहलाने को, बाबा बाग में जाते थे।
प्रमुदित मन में निरख प्रकृति, आनंदित वे हो जाते थे॥95॥

रंग-बिरंगे पुष्प बाग के, मंद-मंद हिल-डुल करके।
बीहड़ वीराने मन में भी स्नेह सलिल भर जाते थे॥96॥

ऐसी सुमधुर बेला में भी, दुख आपात, विपदा के मारे।
अपने मन की व्यथा सुनाने, जन रहते बाबा को घेरे॥97॥

सुनकर जिनकी करूणकथा को, नयन कमल भर आते थे।
दे विभूति हर व्यथा, शांति, उनके उर में भर देते थे॥98॥

जाने क्या अद्भुत शक्ति, उस विभूति में होती थी।
जो धारण करते मस्तक पर, दुख सारा हर लेती थी॥99॥

धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन, जो बाबा साईं के पाए।
धन्य कमल कर उनके जिनसे, चरण-कमल वे परसाए॥100॥

काश निर्भय तुमको भी, साक्षात् साईं मिल जाता।
वर्षों से उजड़ा चमन अपना, फिर से आज खिल जाता॥101॥

गर पकड़ता मैं चरण श्री के, नहीं छोड़ता उम्रभर।
मना लेता मैं जरूर उनको, गर रूठते साईं मुझ पर॥102॥

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Lakshmi Chalisa in Hindi: लक्ष्मी चालीसा पढ़कर करें धन की देवी को प्रसन्न https://hrelate.com/astrology/lakshmi-chalisa-in-hindi/ https://hrelate.com/astrology/lakshmi-chalisa-in-hindi/#respond Sat, 21 Oct 2017 10:00:43 +0000 https://hrelate.com/astrology/?p=16555 Lakshmi Chalisa – वैदिक हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार माँ लक्ष्मी को धन की देवी कह कर संबोधित किया जाता है। माँ लक्ष्मी का प्रदुर्भाव या आगमन देवता और दानवों द्वारा मिलकर किये...

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Lakshmi Chalisa – वैदिक हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार माँ लक्ष्मी को धन की देवी कह कर संबोधित किया जाता है। माँ लक्ष्मी का प्रदुर्भाव या आगमन देवता और दानवों द्वारा मिलकर किये गए ऐतिहासिक समुद्र मंथन से हुआ था। हिन्दू मान्यताओं में प्रसिद्ध एक कथा के अनुसार देवताओं की शक्ति के क्षीण हो जाने के पश्चात उसकी पुनः प्राप्ति करने के लिए देवताओं और दानवों ने भगवान श्री नारायण विष्णु के कहने पर अनंत समुद्र का मंथन किया था।

समुद्र मंथन से 14 रत्नों की प्राप्ति हुई। इन में प्रमुख अमृत, विष और माता लक्ष्मी इत्यादि थे। जहाँ अमृत का सेवन स्वर्ग के सभी देवताओं ने किया। वहीं विष के कोप से पृथ्वी को भगवान भोलेनाथ खुद विष ग्रहण करके बचाया। अमृत और विष के संग निकली माता लक्ष्मी के एक हाथ में धन का कलश और दूसरे में अभय की मुद्रा थी। माता लक्ष्मी से भगवान विष्णु ने विवाह कर के उन्हें अपनी अर्धांग्नी बना लिया।

वैसे तो माता लक्ष्मी की आराधना कई तरह से उनके उपासक करते हैं। कई उपासक लक्ष्मी पूजन में बहुत सारी कठिन मंत्रोचार आदि का उच्चारण करते हैं, परन्तु संस्कृत ना जानने वाला आम आदमी इस तरह के मंत्रोचार में परेशानी महसूस करता है, वो इतने कठिन उच्चारण को पढ़ते समय ग़लतियाँ कर देता है।

इन उच्चारण सम्बन्धी गलतियों से निजात पा कर बिना किसी फ़िक्र के भी माता लक्ष्मी की पूजा इत्मीनान से की जा सकती है। ये आसान पूजन विधि सिर्फ लक्ष्मी चालीसा के चालीस आसान छंद पढ़ कर भी किये जा सकते हैं। माता लक्ष्मी की आराधना में लक्ष्मी चालीसा का भी विशेष महत्व है। यहाँ पढ़े Lakshmi Chalisa in Hindi.

Lakshmi Chalisa in Hindi: माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए

Lakshmi Chalisa

माता लक्ष्मी जी को धन, सम्पदा, समृद्धि और वैभव की देवी माना जाता है। माँ लक्ष्मी का स्वभाव बहुत ही चंचल होता है। जिस भी इंसान के ऊपर माँ लक्ष्मी अपनी कृपा दृष्टि रखती है। उस इंसान के जीवन में धन और वैभव की कभी भी कोई कमी नहीं होती है। मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक दिन लक्ष्मी जी की पूजा अर्चना करने से मनुष्य को जीवन भर दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ता है। माता लक्ष्मी जी की पूजा अर्चना में कई तरह के मंत्रों और श्लोकों का प्रयोग किया जाता है।

हर साल दीपावली के त्यौहार पर माता लक्ष्मी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। इस पूजा में माता लक्ष्मी के साथ प्रथम पूज्य सिद्धि विनायक भगवान गणेश तथा विद्या और बुद्धि की देवी माता सरस्वती की उपासना बड़े धूम धाम से की जाती है। जहाँ माता लक्ष्मी को धन की देवी और माता सरस्वती को ज्ञान की देवी कहा जाता है वहीं भगवान गणेश बुद्धि के देवता कहलाते है।

चालीसा पाठ कर के देवी देवताओं की पूजा अर्चना का भी अपना अलग और व्यापक महत्व होता है। साधू संतों और महर्षियों द्वारा ऐसा कहा गया है कि गृहस्थ जीवन में अपना जीवन यापन कर रहे मनुष्य सिर्फ चालीसा पाठ कर के भी देवी देवताओं से उतना ही फल प्राप्त कर सकते हैं। जितना संन्यास प्राप्त सन्यासी पूरा जीवन पूजा अर्चना में लगा कर प्राप्त करते हैं।

आजकल बहुत कम लोग संस्कृत भाषा को समझ और पढ़ पाते हैं, और वृहत पूजन विधियों में लम्बे लम्बे और कलिष्ट मन्त्रों का उच्चारण जरुरी होता है। आम लोग इन मन्त्रों का सही उच्चारण नहीं कर पाते हैं। इन्हीं आम लोगो के लिए चालीसा पाठ विधि के द्वारा की गई पूजा एक रामवाण पूजन की विधि है।

कहा जाता है कि कलयुग में सबसे ज्यादा पूजी जाने वाली देवी हैं माता लक्ष्मी। आज लोग सबसे ज्यादा कामना धन और वैभव की ही करते हैं। इसलिए धन की देवी माता लक्ष्मी की पूजा सबसे ज्यादा की जाती है। अगर आप भी धन और वैभव की प्राप्ति करना चाहते है तो जरूर पढ़े माता लक्ष्मी की चालीसा –

Lakshmi Chalisa | लक्ष्मी चालीसा

Lakshmi Chalisa

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Krishna Chalisa in Hindi: श्री कृष्ण चालीसा पाठ की विधि और महत्व https://hrelate.com/astrology/krishna-chalisa/ https://hrelate.com/astrology/krishna-chalisa/#respond Sat, 07 Oct 2017 09:15:38 +0000 https://hrelate.com/astrology/?p=16532 भगवान श्री कृष्ण त्रिदेवों में से एक भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं। भगवान श्री कृष्ण समस्त लोगों में मौजूद जीवों को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले सबसे प्रमुख देवता कहलाते हैं। जब...

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भगवान श्री कृष्ण त्रिदेवों में से एक भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं। भगवान श्री कृष्ण समस्त लोगों में मौजूद जीवों को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले सबसे प्रमुख देवता कहलाते हैं। जब जब धरती पर अधर्म का जन्म होता है तब तब भगवान श्री कृष्ण किसी न किसी रूप में अवतार लेकर धरती को पाप से मुक्ती दिलाते हैं।

भगवान श्री कृष्ण के अवतार और उनके चमत्कार के बारे में श्रीमद भागवत पुराण और पदम् पुराण में पूरे विस्तार से जानकारी दी गई है। भगवान विष्णु ने अभी तक तेईस अवतारों को धारण किया है। इन सभी अवतारों में भगवान श्री राम और श्री कृष्ण के अवतार को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है।

भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत में अपनी अहम् भूमिका निभाई थी। महाभारत में जब पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध हुआ था, तब युद्ध के दौरान भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के सारथी बने हुए थे। इसी दौरान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध भूमि में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।

जो भी इंसान भक्ति भाव से श्री कृष्ण की पूजा अर्चना और वन्दना करता है। उस इंसान को सुख, शांति और सफलता की प्राप्ति होती है। श्री कृष्ण वंदना के लिए लोग “हरे कृष्णा हरे कृष्णा” का जाप करते हैं। साथ ही श्री कृष्ण जी की पूजा में उनकी चालीसा का पाठ करना भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण माना गया है। यहाँ पढ़िए Krishna Chalisa in Hindi.

Krishna Chalisa in Hindi – कृष्ण चालीसा पढ़े और अपना उद्धार करें

Krishna Chalisa

आप किसी भी भगवान की चलिसा पढ़ें उसका सकारात्मक प्रभाव हमारे जीवन में जरूर पड़ता हैं। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार आसान व् कम समय में पढ़े जाने वाली चालीसा का पाठ बहुत प्रभावी होता है। ज्यादातर श्रद्धालुओं को संस्कृत के मन्त्रों का जाप और उच्चारण करते समय परेशानी का सामना करना पड़ता है, उन लोगों के लिए भी आराधना की सबसे बेहतर विधि चालीसा का पाठ करना होता है।

चालीसा का महत्व

  • सरल और आम भाषा में की जाने वाली भगवान की आराधना को ही चालीसा पाठ कहा जाता है।
  • इसके द्वारा भक्त अपने ईश्वर या इष्ट को खुश करने का प्रयास करता है।
  • ज्यादातर लोग अपनी कठिनाइओं के निदान की आकांक्षा में चालीसा का पाठ करते हैं।
  • इसे चालीसा कहे जाने का मुख्य कारण इसमें मौजूद 40 पंगतिया होती हैं।
  • सरल और आम भाषा में होने के कारण इसे बड़ी आसानी से कोई भी पढ़ सकता है।
  • चालीसा में लिखे अलग अलग पंगतियों का अलग अलग और व्यापक महत्व होता है।

चालीसा को पढ़ने की उत्तम विधि

चालीसा का पाठ भगवान को प्रसन्न करने की सबसे आसान विधि में से एक होती है। केवल वासुदेव श्री कृष्णा ही नहीं बल्कि भगवान शंकर, बजरंगबली, माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी आदि को प्रसन्न करने के लिए भी चालीसा उपलब्ध है। परन्तु कम लोग ही चालीसा पाठ करने की सही विधि जानते हैं। आइये जानते हैं चालीसा पाठ की उत्तम विधियों से जुड़े तथ्य।

  • सबसे पहले तो चालीसा पाठ के पहले जिनकी चालीसा पढ़ी जा रही है उनकी तस्वीर या मूर्ती अपने सामने जरूर रख लें।
  • श्री कृष्ण चालीसा के पाठ के लिए भगवान श्री कृष्ण की मूर्ती या चित्र के समक्ष बैठ जाएँ।
  • मूर्ती के सामने एक धातु के जलपात्र में जल भर कर सामने रख लें।
  • इसके बाद ही चालीसा का पाठ करें।
  • तीन बार चालीसा पाठ को दोहराना सर्वोत्तम माना जाता है।
  • चालीसा पाठ के बाद सामने रखे जलपात्र के जल को प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
  • इस बात की ध्यान रखना चाहिए कि आपके द्वारा की जाने वाली चालीसा पाठ का समय हर दिन एक हो।
  • यात्राओं के समय या फिर सोते हुए भी चालीसा का पाठ किया जा सकता है, पर ऐसा तभी करें जब आप विशेष स्थिति में पाठ करने से अक्षम हों।
  • चालीसा में लिखी पंगतियों का जाप आप मन में भी कर सकते है।
  • परन्तु अगर चालीसा पाठ गा कर या फिर बोल कर किया जाए तो उसे सर्वोत्तम माना जाता है।
  • श्री कृष्ण जी की चालीसा को किसी दिवस में बांधा नहीं गया है, इसलिए इसका पाठ आप सप्ताह के किसी भी दिन कर सकते हैं।

श्री कृष्ण चालीसा

Krishna Chalisa

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Durga Chalisa: नियमित पढ़े होगा दुखों का नाश और सुख का वास https://hrelate.com/astrology/durga-chalisa-hindi/ https://hrelate.com/astrology/durga-chalisa-hindi/#comments Sat, 15 Jul 2017 09:38:07 +0000 https://hrelate.com/astrology/?p=16330 दुर्गा देवी हिन्दुओं ही प्रमुख देवी है। हिन्दू धर्म में दुर्गाजी को आदिशक्ति भी कहा जाता है। वे शान्ति, समृद्धि तथा धर्म पर प्रहार करने वाली राक्षसी शक्तियों का विनाश करतीं हैं। उन्होने महिषासुर...

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दुर्गा देवी हिन्दुओं ही प्रमुख देवी है। हिन्दू धर्म में दुर्गाजी को आदिशक्ति भी कहा जाता है। वे शान्ति, समृद्धि तथा धर्म पर प्रहार करने वाली राक्षसी शक्तियों का विनाश करतीं हैं।

उन्होने महिषासुर जैसे असुर का वध किया। दुर्गा, पार्वती का दूसरा नाम है। दुर्गा देवी की उपासना से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और उन्हें कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

माता दुर्गा जी की साधना के लिए श्री दुर्गा चालीसा को बेहद प्रभावशाली माना जाता है। दुर्गा चालीसा एक पवित्र पाठ है जिसे भक्त-गण बहुत सी आशाओं के साथ इसका पाठ करते हैं। देवी दुर्गा को दुर्गति नाशिनि माना जाता है जो कि भक्तों को सुगम गति प्रदान करती है।

हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवी माना जाता है। दुर्गा मां को जल्द प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद सदैव अपने परिवार पर बनाएं रखने के लिए प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन दुर्गा चालीसा का पाठ करना चाहिए। जिससे देवी माँ की कृपा दृष्टि बनी रहती है। आइये जानते है Durga Chalisa अर्थ सहित|

Durga Chalisa in Hindi: श्री दुर्गा चालीसा का पाठ अर्थ के साथ

Durga Chalisa

॥चौपाई॥

    नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥

निराकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥

सुख को देने करने वाली हे मां दुर्गा आपको प्रणाम  है। दुखों का हरण करने वाली हे मां अंबे आपको नमन है। आपकी ज्योति निराकार है, उसका कोई आकार नहीं है, आपकी ज्योति का प्रकाश तीनों लोकों में व्याप्त है। आपके मुख विशाल मस्तक पर चंद्रमा है। हे मां दुर्गा आपके नेत्र लाल व भृकुटि विकराल है। हे मां आपका रुप बहुत ही सुंदर है जिसका दर्शन करने मात्र से सुख की प्राप्ति होती है।

तुम संसार शक्ति लय कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

आपने ही संसार में शक्ति का संचार किया, इस संसार के पालन-पोषण के लिए अन्न धन सब आपने प्रदान किया है। इसलिए जगत की पालक होने के कारण आपको अन्नपूर्णा भी कहा जाता हैं। आप ही जगत को पैदा करने वाली आदि सुंदरी बाला अर्थात जगत जननी हो। प्रलयकाल में आप ही सब कुछ नष्ट करती हैं। हे मां आप ही तो शिव शंकर की प्यारी गौरी, यानि पार्वती हैं। भगवान शिव सहित -सभी योगी आपका गुणगान करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु भी आपका नित ध्यान लगाते हैं।

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा॥

धरा रूप नरसिंह को अम्बा। प्रगट भईं फाड़कर खम्बा॥

रक्षा कर प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

आपने ही देवी सरस्वती का रुप धारण किया और ऋषि-मुनियों को सद्बुद्धि देकर उनको मुक्ति प्रदान की। आपने ही खम्बे को फाड़कर प्रकट हुई और अंबा का रुप धारण किया। आपने ही हरिण्याकश्यपु जैसे दुष्ट का संहार करके ईश्वर के भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। देवी माँ अपने ही इस संसार में लक्ष्मी का रुप धारण किया और भगवान श्री नारायण अर्थात विष्णु की पत्नी बनी।

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

आप क्षीरसागर अर्थात दुध के सागर में वास करती हैं। आप दया की सागर हैं, मां मेरी आशाओं को भी पूर्ति करें। आप ही हिंगलाज में भवानी हैं। आपकी महिमा अनंत हैं, उसका बखान नहीं किया जा सकता। मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी, बगला माता आप ही हैं, जो सुख देती करती हैं। आप ही श्री भैरवी हैं व आप ही जग को तारण करने वाली मां तारा हैं, आप ही दुखों का नाश करने वाली माता छिन्नमस्ता हैं।

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥

कर में खप्पर-खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजे॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुंलोक में डंका बाजत॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥

हे भवानी मां आप शेर की सवारी करती हैं लागुंर वीर यानि भगवान श्री बजरंग बलि हनुमान आपकी अगवानी करते हुए चलते हैं। आपके हाथों में खप्पर (खोपड़ी) व तलवार रहने के कारण उसके डर से काल (यमराज) भी डर कर भाग जाता है।

आपके पास हथियार, त्रिशूल हैं जिन्हें देखकर शत्रू भय से कांपने लगते हैं। हे मां आप ही नगरकोट में विराजमान हैं और आपका डंका तीनों लोकों में बजता है। आपने ही शुम्भ और निशुम्भ दानवों का नाश किया| अनगिनत रक्तबीजों (शुम्भ निशुम्भ की सेना का एक दैत्य जिसे वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की बूंद गिरने से उस जैसे अनेक रक्तबीज पैदा होंगे) का आपने ही संहार किया।

महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावै। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

महिषासुर असुर बहुत ही अभिमानी था जिसके पाप से धरती पर बहुत भार बढ़ गया था। काली का विकराल रुप धारण कर महिषासुर व उसकी सेना का आपने ही अंत किया। जब भी सत्य का साथ देने वाले सज्जनों पर कोई संकट आया है तब तब आप ही उनकी सहायक बनी हैं। आपकी महिमा से अमरपुरी के साथ-साथ अन्य लोक भी शोक रहित रहते हैं।

हे मां आप ही ज्वाला जी पर ज्योति के रुप में विराजमान हैं, नर-नारी सदा आपकी पूजा अर्चना करते हैं। प्रेम व भक्ति सहित जो भी आपके यश का गुणगान करता है, उसके निकट कभी भी दुख व दरिद्रता नहीं आती।

जो भी सच्चे मन से आपका ध्यान करता है, वह जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता हैं, अर्थात उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।योगी, देवता, मुनि सब अपनी साधना को अर्थपूर्ण करने के लिए आपको पुकारते हैं,क्योंकि आपकी शक्ति के बिना योग नहीं हो सकता|

शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

शक्ति रूप को मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

आदि गुरु शंकराचार्य ने भारी तप करके काम क्रोध पर विजय प्राप्त की, परन्तु उन्होंनें केवल दिन-रात भगवान शंकर का ध्यान किया और आपका स्मरण किसी भी क्षण नहीं किया।

उन्होंनें शक्ति रुप को नहीं समझा और जब उनके पास से शक्ति चली गई तब वे बहुत पछताये तथा आपकी शरण में आकर आपके यश का गुणगान का बखान करते हुए हे जगदम्बा भवानी मां उन्होंनें आपकी जय-जयकार की। तदनन्तर आदि शंकराचार्य की भक्ति से प्रसन्न होकर आपने उन्हें बिना किसी विलम्ब शक्तियां दी।

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

आशा तृष्णा निपट सतावे। मोह मदादिक सब विनशावै॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥

जब लगि जियउं दया फल पाऊं। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥

हे देवी मां अनेक कष्टों ने मुझे भी घेर लिया है, मेरे इन कष्टों का हरण आपके बिना और कौन कर सकता है। मुझे आशा, तृष्णा सताती हैं, साथ ही मोह, अंहकार भी तंग करते हैं, मुझे भ्रमित करते हैं। हे मां भवानी आप क्रोध, काम, लोभ, मोह, जैसे अहंकार रुपी मेरे इन शत्रुओं का विनाश करें ताकि में एकाग्र होकर पूर्ण मन से आपका ध्यान कर सकूI

हे दयालु माता मुझ पर दया करे और ऋद्धि-सिद्धि प्रदान कर मेरा कल्याण करें। हे मां मुझे वरदान प्रदान करे कि जब तक मैं जीवित रहूं, आपकी कृपा दृष्टि मुझ पर बनी रहे व मैं आपकी कीर्ति और यश को सदैव सुनाता रहू।

दुर्गा चालीसा जो नित गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

जो कोई भी प्रतिदिन दुर्गा चालीसा को गाता है वह सर्व सुखो को ग्रहण कर मोक्ष को प्राप्त करता है। हे जगदंबे भवानी मां देवीदास को अपनी शरण में जानकर अपनी कृपा करती रहना।

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अकाल मृत्यु से बचना चाहते है तो जरूर पढ़े शिव चालीसा https://hrelate.com/astrology/shiv-chalisa-hindi/ https://hrelate.com/astrology/shiv-chalisa-hindi/#comments Thu, 06 Jul 2017 09:45:50 +0000 https://hrelate.com/astrology/?p=16281 हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही विश्व के रचियता, संचालक और पालनकर्ता है। त्रिदेवों में भगवान् शिव को संहारक माना गया है। लेकिन उनके भोले स्वाभाव के कारण ही...

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हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही विश्व के रचियता, संचालक और पालनकर्ता है। त्रिदेवों में भगवान् शिव को संहारक माना गया है। लेकिन उनके भोले स्वाभाव के कारण ही उन्हें भोलेनाथ कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव की उपासना करने वाले व्यक्ति को कभी अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता है।

अगर आप किसी परेशानी या दुःख का सामना कर रहे है तो नियमित रूप से शिव चालीसा का पाठ करें। आनंद की अनुभूति दिलाने वाले भगवान भोलेनाथ की शिव चालीसा का अपना अलग महत्व है। यह आपके कष्टों और दुखों का नाश करने में सहायक है। इस पाठ को करने से शिव जी की कृपा सदैव आपके परिवार पर बनी रहती है।

अगर आप भगवान शिव जी विशेष कृपा प्राप्त करना चाहते है तो श्रावण मास में शिव चालीसा का पाठ जरूर करना चाहिए। यहाँ हम आपके लिए पूरी शिव चालीसा का अर्थ के साथ वर्णन कर रहे है। आइये जाने Shiv Chalisa in Hindi.

Shiv Chalisa in Hindi: शिव चालीसा का पाठ अर्थ के साथ

Shiv Chalisa

॥दोहा॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।

कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

हे गिरिजा पुत्र भगवान श्री गणेश आपकी जय हो। आप मंगलकारी हैं, विद्वता के दाता हैं, अयोध्यादास की प्रार्थना है कि प्रभु आप ऐसा वरदान दें जिससे सारे भय समाप्त हो जाएं।

॥चौपाई॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

हे गिरिजा पति, दीन हीन पर दया बरसाने वाले प्रभु शिव आपकी जय हो, आप हमेशा संतो के प्रतिपालक रहे हैं। आपके मस्तक पर छोटा सा चंद्रमा शोभायमान है, आपने कानों में नागफनी के कुंडल डाल रखें हैं।

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥

आपकी जटाओं से ही गंगा बहती है, आपके गले में मुंडमाल है। बाघ की खाल के वस्त्र भी आपके तन पर जंच रहे हैं। आपकी छवि को देखकर नाग भी आकर्षित होते हैं।

मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

माता मैनावंती की दुलारी अर्थात माता पार्वती जी आपके बांये अंग में हैं, उनकी छवि भी अलग से मन को हर्षित करती है, अर्थात आपकी पत्नी के रुप में माता पार्वती भी पूजनीय हैं। आपके हाथों में त्रिशूल आपकी छवि को ओर भी आकर्षित बनाता है। आपने हमेशा शत्रुओं का नाश किया है।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

आपके सानिध्य में नंदी व गणेश सागर के बीच खिले कमल के समान दिखाई देते हैं। कार्तिकेय व अन्य गणों की उपस्थिति से आपकी छवि ऐसी बनती है, जिसका वर्णन कोई नहीं कर सकता है।

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

हे भगवन, देवताओं ने जब भी आपको पुकारा है, तुरंत आपने उनके दुखों का निवारण किया है। तारक जैसे राक्षस के उत्पात से परेशान देवताओं ने जब आपकी शरण ली, आपकी गुहार लगाई। हे प्रभू आपने तुरंत तारकसुर को मारने के लिए षडानन (भगवान शिव व पार्वती के पुत्र कार्तिकेय) को भेजा। आपने ही जलंधर नामक असुर का संहार किया। आपके कल्याणकारी यश को पूरा संसार जानता है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

हे शिव शंकर आपने ही त्रिपुरासुर के साथ युद्ध कर उनका संहार किया व सब पर अपनी कृपा की। हे भगवन भागीरथ के तप से प्रसन्न हो कर उनके पूर्वजों की आत्मा को शांति दिलाने की उनकी प्रतिज्ञा को आपने पूरा किया।

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

हे प्रभू आपके समान दानी ओर कोई नहीं है, सेवक आपकी सदा से स्तुति करते आए हैं। हे प्रभु आपका भेद सिर्फ आप ही जानते हैं, क्योंकि आप अनादि काल से विद्यमान हैं, आपके बारे में वर्णन नहीं किया जा सकता है, आप अकथ हैं। आपकी महिमा का गान करने में तो वेद भी असमर्थ हैं।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

हे प्रभु जब क्षीर सागर के मंथन में विष से भरा घड़ा निकला तो समस्त देवता व दैत्य भय से कांपने लगे, तब आपने ही सब पर कृपा बरसाते हुए इस विष को अपने कंठ में धारण किया जिससे आपका नाम नीलकंठ हुआ।

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

हे नीलकंठ आपकी पूजा करके ही भगवान श्री रामचंद्र लंका को जीत कर उसे विभीषण को सौंपने में कामयाब हुए। इतना ही नहीं जब श्री राम मां शक्ति की पूजा कर रहे थे और सेवा में कमल अर्पण कर रहे थे, तो आपके ईशारे पर ही देवी ने उनकी परीक्षा लेते हुए एक कमल को छुपा लिया। अपनी पूजा को पूरा करने के लिए राजीवनयन भगवान राम ने, कमल की जगह अपनी आंख से पूजा संपन्न करने की ठानी, तब आप प्रसन्न हुए और उन्हें इच्छित वर प्रदान किया।

जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट ते मोहि आन उबारो॥

हे अनंत एवं नष्ट न होने वाले अविनाशी भगवान भोलेनाथ, सब पर कृपा करने वाले, सबके घट में वास करने वाले शिव शंभू, आपकी जय हो। हे प्रभु काम, क्रोध, मोह, लोभ, अंहकार जैसे तमाम दुष्ट मुझे सताते रहते हैं। इन्होंनें मुझे भ्रम में डाल दिया है, जिससे मुझे शांति नहीं मिल पाती है। हे स्वामी, इस विनाशकारी स्थिति से मुझे उभार लो यही उचित अवसर। अर्थात जब मैं इस समय आपकी शरण में हूं, मुझे अपनी भक्ति में लीन कर मुझे मोहमाया से मुक्ति दिलाओ, सांसारिक कष्टों से उभारों। अपने त्रिशुल से इन तमाम दुष्टों का नाश कर दो। हे भोलेनाथ, आकर मुझे इन कष्टों से मुक्ति दिलाओ।

मात–पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥

धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

हे प्रभु वैसे तो जगत के नातों में माता-पिता, भाई-बंधु, नाते-रिश्तेदार सब होते हैं, लेकिन विपदा पड़ने पर कोई भी साथ नहीं देता। हे स्वामी, बस आपकी ही आस है, आकर मेरे संकटों को हर लो। आपने सदा निर्धन को धन दिया है, जिसने जैसा फल चाहा, आपकी भक्ति से वैसा फल प्राप्त किया है। हम आपकी स्तुति, आपकी प्रार्थना किस विधि से करें अर्थात हम अज्ञानी है प्रभु, अगर आपकी पूजा करने में कोई चूक हुई हो तो हे स्वामी, हमें क्षमा कर देना।

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥

हे शिव शंकर आप तो संकटों का नाश करने वाले हो, भक्तों का कल्याण व बाधाओं को दूर करने वाले हो योगी यति ऋषि मुनि सभी आपका ध्यान लगाते हैं। शारद नारद सभी आपको शीश नवाते हैं।

नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥

हे भोलेनाथ आपको नमन है। जिसका ब्रह्मा आदि देवता भी भेद न जान सके, हे शिव आपकी जय हो। जो भी इस पाठ को मन लगाकर करेगा, शिव शम्भु उनकी रक्षा करेंगें, आपकी कृपा उन पर बरसेगी।

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥

पुत्र होन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥

पवित्र मन से इस पाठ को करने से भगवान शिव कर्ज में डूबे को भी समृद्ध बना देते हैं। यदि कोई संतान हीन हो तो उसकी इच्छा को भी भगवान शिव का प्रसाद निश्चित रुप से मिलता है। त्रयोदशी को पंडित बुलाकर हवन करवाने, ध्यान करने और व्रत रखने से किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं रहता। (चंद्रमास का तेरहवां दिन त्रयोदशी कहलाता है, हर चंद्रमास में दो त्रयोदशी आती हैं, एक कृष्ण पक्ष में व एक शुक्ल पक्ष में)

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

अयोध्यादास आस कहैं तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

जो कोई भी धूप, दीप, नैवेद्य चढाकर भगवान शंकर के सामने इस पाठ को सुनाता है, भगवान भोलेनाथ उसके जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश करते हैं। अंतकाल में भगवान शिव के धाम शिवपुर अर्थात स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उसे मोक्ष मिलता है। अयोध्यादास को प्रभु आपकी आस है, आप तो सबकुछ जानते हैं, इसलिए हमारे सारे दुख दूर करो भगवन।

॥दोहा॥

नित्त नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीसा।

तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

मगसिर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।

स्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

हर रोज नियम से उठकर प्रात:काल में इस चालीसा का पाठ करें और भगवान भोलेनाथ जो इस जगत के ईश्वर हैं, उनसे अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करें।

संवत 64 में मंगसिर मास की छठि तिथि और हेमंत ऋतु के समय में भगवान शिव की स्तुति में यह चालीसा लोगों के कल्याण के लिए पूर्ण की गई।

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क्या आप जानते है हनुमान चालीसा पाठ के ये आश्चर्यजनक लाभ? https://hrelate.com/astrology/hanuman-chalisa-benefits/ https://hrelate.com/astrology/hanuman-chalisa-benefits/#comments Fri, 30 Jun 2017 13:15:26 +0000 https://hrelate.com/astrology/?p=16165 भारत में हनुमान चालीसा का पाठ हर हिन्दू परिवार में होता है। अगर आप भी यह पाठ करना चाहते है तो यहाँ हम आपको पूरी हनुमान चालीसा हिंदी में वर्णित कर रहे है। साथ...

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भारत में हनुमान चालीसा का पाठ हर हिन्दू परिवार में होता है। अगर आप भी यह पाठ करना चाहते है तो यहाँ हम आपको पूरी हनुमान चालीसा हिंदी में वर्णित कर रहे है। साथ ही हम आपको इस पाठ को करने से होने वालो लाभ को बता रहे है। तो आइये जानते है Hanuman Chalisa Benefits.

Hanuman Chalisa Benefits: हनुमान चालीसा पढ़े और इसके लाभ जानिए

Hanuman Chalisa Benefits

Hanuman Chalisa

हनुमान चालीसा के फायदे

Hanuman Chalisa Benefits

बुरी आत्माओं को दूर रखे

हनुमान जी बहुत ही शक्तिशाली और बलशाली है। वे किसी से भी नहीं डरते है। हनुमान जी हर प्रकार की बुरी आत्म का नाश कर के लोगो को उनसे मुक्ति दिलाते है। जिन लोगों को रात में डर या फिर उनके सपनो में बुरे विचार आते है। उन लोगो को नित नियम से रोज़ाना हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए।

साढे़ साती का प्रभाव कम करे

हनुमान चालीसा का पाठ करने से आप शनि देव को खुश कर सकते है और ऐसा करने से साढे साती के प्रभाव को कम करने में सफलता प्राप्त कर सकते है। शास्त्रों में कहा गया है कि बजरंग वाली ने भगवान शनि की जान की रक्षा की थी। इसके बाद शनि देव ने खुश होकर हनुमान जी को कहा था कि हनुमान भक्त को शनि देव कोई भी नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।

इच्छाओं की करें पूर्ति

हर किसी की अपनी इच्छाएं होती है। मगर सभी लोगो की इच्छाओ की पूर्ति का होना संभव नहीं है। अगर आप अपनी इच्छा को पूरा करना चाहते है, तो इसके लिए आप को हनुमान चालीसा का पाठ करना होगा, इससे आप को बहुत लाभ होगा।

पाप से दिलाए मुक्ती

हम सभी लोगों ने कभी ना कभी जाने अनजाने में कुछ गलतियां की होंगी। आप इस गलती की माफ़ी हनुमान चालीसा के पाठ को पढ़ कर मांग सकते है। यदि रात के समय हनुमान चालीसा को 8 बार पढ़ा जाये, तो सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है।

तब पढ़ें हनुमान चालीसा

वैसे तो हनुमान चालीसा का पाठ किसी भी समय में किया जा सकता है। परन्तु मनुष्य किसी प्रकार के डर, भय, संकट या फिर विपत्ति के आने पर बहुत ज्यादा ही घबरा जाता है। ऐसे समय में आप हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करें। ऐसा करने से आप के मन से सारा डर समाप्त हो जाता है।

बाधा दूर करने में

जिस प्रकार से भगवान गणेश हम सभी के कष्ट को दूर करते है। उसी प्रकार से हनुमान जी भी हमारे कष्ट को हरते है। इसलिए अगर आप किसी तरह की बढ़ा महसूस कर रहे है तो हनुमान चालीसा का पाठ करें।

क्षमा मांगने के लिए

यदि आप से किसी भी प्रकार की गलती हुई हो ओर उस गलती को आप सुधारना चाहते है तो आप हनुमान चालीसा का पाठ करें। ऐसा करने से आपका मन बिलकुल हल्का हो जाएगा।

बुद्धि और बल

अगर आप बल और बुद्धि की प्राप्ति करना चाहते है तो इसके लिए आप को हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए, क्योंकि हनुमान जी को बुद्धि और बल का प्रतीक माना जाता है।

तनाव मुक्ति

आज के समय में कई लोग तनाव और टेंशन के शिकार रहते है। इस परेशानी को खत्म करने के लिए आप नियमित रूप से हनुमान चालीसा को पढ़कर मन को शांत और तनाव से रहत पा सकते है।

हनुमान चालीसा के अन्य लाभ

  • बजरंग वाली जी की हनुमान चालीसा का पाठ को 100 बार करने से उनके भक्तो के भाव बंधन से मुक्ति मिलेगी।
  • जिस स्थान पर हनुमान जी का नाम स्मरण किया जाता है। ऐसे स्थानों पर भूत पिशाच पास नहीं आते है।
  • हनुमान जी सीधे व्यक्तियों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।
  • हनुमान चालीसा के सबसे पहले दोहे में गुरु को प्रणाम हो जाता है। कोई भी काम को शुरू करने से पहले गुरुदेव के चरणों में ह्रदय वंदन करने से सारे काम अच्छे से पुरे होते है।
  • हनुमान चालीसा खुद भगवान् शिव ने लिखवाई है, इसलिए भगवान् शिव खुद इस बात के साक्षी है कि जो व्यक्ति हनुमान चालीसा का पाठ करता है, उसे सफलता जरूर मिलती है।

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