Solah Somvar Vrat Katha: शिव को प्रसन्न करने के लिए करे सोलह सोमवार व्रत

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Somvar Vrat Katha – आप सभी लोग जानते ही होंगे कि हमारे हिन्दू धर्म में कई महिलाएं और अविवाहित लड़कियां सोलह सोमवार का व्रत करती है।

इस व्रत को सावन माह में ही करना चाहिए और सोलह सोमवार तक इस व्रत को लगातार रखना चाहिए। इस व्रत को करके अविवाहिताएं मनचाहा वर पा सकती हैं। इसलिए कई लड़किया इस व्रत को रखती है| किन्तु यह जरुरी नहीं है की केवल अविवाहित लड़किया ही इसे करे|

हर उम्र और हर वर्ग के व्यक्ति इसे कर सकते हैं लेकिन नियम की पाबंदी के चलते उन्ही लोगो को इसे करना चाहिए जो इसे करने की क्षमता रखते हैं। आज के लेख में हम आपको Solah Somvar Vrat Katha और इसके फायदे बता रहे है|

Solah Somvar Vrat Katha: जानिए इस कथा से जुड़ा महत्व

Solah Somvar Vrat Katha

पहला अध्याय

सोलह सोमवार की कथा इस प्रकार है। कि एक बार भगवान शिव और माता पार्वती धरती पर घूमने आए थे। धरती पर धूमते धूमते शिव जी और माता पार्वती विदर्भदेश के अमरावती शहर में गए। इस शहर में भगवान शिव का बहुत ही खूबसूरत मंदिर था। इस मंदिर में भगवान शिव और माँ पार्वती रहने लग गए थे। एक दिन ऐसा आया जब माँ पार्वती जी ने बातों बातों में भगवान भोलेनाथ से चौसर खेलने का कह दिया और शिवजी भी राजी हो गए|

इसी समय इस मंदिर का पुजारी वहा पर दैनिक पूजा अर्चना करने के लिए आया। तभी माँ पार्वती ने उस पुजारी से पूछा कि बताओ, हम दोनों में चौसर में कौन जीतेगा| उस मंदिर का पुजारी भगवान शिव का भक्त था। और उसके मुँह से निकल गया कि “महादेव जी जीतेंगे|” इस प्रकार चौसर का खेल शिव जी पार्वती जी के बीच चालू हो गया और देखते ही देखते खेल ख़त्म होने के समय भगवान शिव हार गए। खेल ख़त्म होने के बाद माँ पार्वती जी ने क्रोधित में आकर मंदिर के पुजारी को श्राप देना चाहा तभी भगवान शिव ने माँ पार्वती को रोका और उनसे कहा कि यह तो भाग्य का खेल है। इसमें इस पुजारी की क्या गलती है। परन्तु माँ पार्वती ने भगवान शिव की बिलकुल ना सुनते हुए मंदिर के उस पुजारी को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया और उस पुजारी को कोढ़ हो गया। काफी समय तक मंदिर का पुजारी कोढ़ से पीड़ित रहा।

उसी मंदिर में भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए अप्सरा आई और उन्होंने पुजारी के कोढ को देखते हुए इसके पीछे का कारण पूछा| इस पर मंदिर के पुजारी जी ने अपने साथ हुए इस घटना के बारे में पूरा किस्सा सुना दिया। मंदिर के पुजारी की कहानी सुनकर अप्सराओं ने पुजारी से कहा कि आप सोलह सोमवार का व्रत पूरे विधि विधान करो। इस व्रत को करने से आप के सभी कष्ट और रोग विकार जल्द ही ख़त्म हो जाएंगे।

अप्सरा ने पुजारी से कहा, सोमवार के दिन नहा धोकर साफ़ कपड़े पहन लेना और आधा किलो आटे से पंजरी बना देना, उस पंजरी के तीन भाग करना, प्रदोष काल में भगवान शिव की आराधना करना, इस पंजरी के एक तिहाई हिस्से को आरती में आने वाले लोगो को प्रसाद के रूप में देना| इस तरह सोलह सोमवार तक यही विधि अपनाना, 17वे सोमवार को एक चौथाई गेहू के आटे से चूरमा बना देना और शिवजी को अर्पित कर लोगो में बाट देना, इससे तुम्हारा कोढ़ दूर हो जायेगा“|

इस प्रकार से सोलह सोमवार का व्रत और कथा सुनने से भगवान शिव आपके इस कोढ़ को समाप्त करके आपकी सभी मनोकामनाएँ पूरी कर देंगे और आपके जीवन में वापिस ख़ुशी लौट आएगी। इस कथा के बारे में बताकर अप्सराएँ स्वर्गलोक को चली गईं।

दूसरा अध्याय

एक दिन पुनः भगवान शिव और माँ पार्वती धरती पर आए। भगवान शिव और माँ पार्वती मंदिर में उसी मंदिर में गए| पुजारी को स्वास्थ्य को देखकर माँ पार्वती ने उस पुजारी के स्वस्थ होने के राज को जानना चाहा। तभी उस पुजारी ने बताया कि मैंने सोलह सोमवार का व्रत और कथा की है। जिससे मेरे शरीर के सारे कोढ़ चले गए है। पुजारी की इस व्रत की बात को सुनकर माँ पार्वती बहुत खुश हुई।

इस व्रत को सुनने के बाद माँ पार्वती ने खुद व्रत किया और इस व्रत के फल से उनका पुत्र वापस घर लोट आए और इसके साथ ही वह आज्ञाकारी भी बन गए। भगवान कार्तिके ने अपनी माँ पार्वती जी के उनके मानसिक परिवर्तन कारण जानना चाहा जिसके फल स्वरुप वह घर लौट आए थे। तभी पार्वती जी ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत की कथा के बारे में बताया। जिसे कार्तिके सुनकर बहुत खुश हुए।

इसके पश्चात भगवान कार्तिके ने भी सोलह सोमवार व्रत को अपने ब्राह्मण मित्र से मिलने के लिए रखा और सोलह सोमवार व्रत के करने पर इनकी इच्छा पूर्ण हुयी। कार्तिके जी का ब्राह्मण मित्र ने भी सोलह सोमवार व्रत की महिमा को जानकार यह व्रत किया और विदेश चला गया| वह पर ब्राह्मण एक राजा के यहां स्वयंवर में गया। वहा राजा अपनी पुत्री के विवाह की तैयारी कर रहा था। इस विवाह में कई राज कुमार शामिल होने आए थे। राजा ने इस विवाह में एक शर्त रखी थी। जिस भी राजकुमार के गले में मेरी पुत्री हथिनी वरमाला डालेगी तो उसका विवाह उस राजकुमार से किया जाएगा। इस विवाह समारोह में वह ब्राह्मण वही था। राजकुमारी हथिनी ने वरमाला उस ब्राह्मण को पहना दिया था। राजा ने जो भी शर्त सभा में रखी थी। वही शर्त के अनुसार अपनी पुत्री का विवाह उस ब्राह्मण करवा दिया।

राजकुमारी हथिनी ने अपनी पति से पूछा “आपने ऐसा क्या पुन्य किया जो हथिनी ने दुसरे सभी राजकुमारों को छोडकर आपके गले में वरमाला डाली“| उसने कहा “प्रिये , मैंने अपने मित्र कार्तिकेय के कहने पर सोलह सोमवार व्रत किये थे उसी के परिणामस्वरुप तुम मुझे लक्ष्मी जैसी दुल्हन मिली|”

राजकुमारी ये सुनकर बहुत प्रभावित हुई और उसने भी पुत्र प्राप्ति के लिए सोलह सोमवार व्रत रखा| फलस्वरूप उसके यहाँ एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ और जब पुत्र बड़ा हुआ तो पुत्र ने पूछा “माँ आपने ऐसा क्या किया जो आपको मेरे जैसा पुत्र मिला”| उन्होंने अपने पुत्र को भी सोलह सोमवार व्रत की कथा कि महिमा को बताया।

अपनी माता से सोलह सोमवार की कथा के बारे में जानने पर इनके पुत्र ने भी राजपाट पाने के लिए इस व्रत को रखा। उसी समय वहा के राजा अपनी पुत्री के लिए एक अच्छे वर की तलाश कर रहे थे। तभी राजा की पुत्री के लिए इस बालक को विवाह के लिए उचित बताया गया। इस बालक के बारे में राजा को सूचना मिलने पर उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह इस बालक के साथ कर दिया।

तीसरा अध्याय

कुछ समय के बाद उस राजा की मृत्यु हो गई। तो उस नगर का राजा ब्राह्मण के पुत्र को बनाया गया क्योंकि राजा के कोई भी पुत्र नहीं थे। इसलिए उनकी लड़की के पति को ही राजा बनाया गया। ब्राह्मण पुत्र को राजपाट मिलने पर भी वो नित नियम से सोलह सोमवार का व्रत और कथा करते रहे। एक दिन 17 वे सोलह सोमवार के दिन पर उनकी पत्नी को भगवान शिव की पूजा अर्चना करने के लिए उनको आने को कहा, परन्तु राजकुमारी स्वयं नहीं आई उन्होंने अपनी दासी को भेज दिया था। ब्राह्मण पुत्र की पूजा समाप्त होने पर आकाशवाणी हुई “तुम्हारी पत्नी को अपने महल से दूर रखो, वरना तुम्हारा विनाश हो जाएगा ” इस आकाशवाणी को सुनकर ब्रह्माणपुत्र अचंबित हो गए।

ब्राहमण पुत्र अपने राजमहल पर आकर उन्होंने अपने दरबारियों को बात बताई। तो दरबारियों ने राजा से कहा जिसकी वजह से आप को यह राजपाट, महल मिला है। आप उसी को अपने महल और जिंदगी से बाहर निकाल रहे है। मगर ब्राहमण पुत्र ने किसी की भी न सुनते हुए अपनी राजकुमारी को महल से बाहर निकलवा दिया।

वह राजकुमारी भूखी, प्यासी किसी एक अनजान नगर में चली गई। उस नगर में उनको एक बूढी औरत मिली जो धागा बेचने बाजार जा रही थी। तभी उस बूढी औरत ने राजकुमारी की मदद की और उसने सोचा की मुझे भी अपने व्यापार में मदद भी मिल जाएगी। और राजकुमारी ने भी उस बूढी औरत की मदद के लिए अपने सिर पर टोकरी रख ली। कुछ दूर जाते ही उनको एक तूफान का सामान करना पड़ा जिससे उनके टोकरी उड़कर चली गई। वह बूढी औरत रोने लगी और उसने राजकुमारी को मनहूस कहते हुए चले जाने को कहा।

वह राजकुमारी उसके बाद एक तेली के घर जा पहुंची जहा पर उनसे तेल के सारे घड़े फुट गए और उसमें से तेल बहने लग गया। उस तेली ने भी उस राजकुमारी को मनहूस कहकर वहा से भी भगा दिया। फिर उसके बाद राजकुमारी एक सुन्दर तालाब के पास जा पहुंची और प्यास बुझाने के लिए जैसे ही वह पानी पिने लगी तभी उस समय तालाब के पानी में कीड़े चलने लगे और सारा का सारा पानी धुंधला हो गया।

राजकुमारी ने अपने आप को दुर्भाग्य बोलते हुए उस तालाब के गंदे पानी को पी लिया और पेड़ के नीचे जाकर सो गयी | जिस पेड़ के नीचे वह सोई उस पेड़ की सारी पत्तिया झड़ गयी| जब भी राजकुमारी किसी भी पेड़ के पास जाती तो उसकी सारी पत्तिया गिर जाती थी|

यह सब देखकर उस नगर के लोग वहा के मंदिर के पुजारी के पास गए। मंदिर के पुजारी ने राजकुमारी के इस दर्द को समझा और उन्होंने कहा बेटी तुम मेरे परिवार के साथ रहो, मै तुम्हे अपनी बेटी की तरह रखूंगा, तुम्हे मेरे आश्रम में कोई तकलीफ नही होगी” इस तरह वो आश्रम में रहने लग गयी अब वो जो भी खाना बनाती या पानी लाती उसमे कीड़े पड़ जाते|

ऐसा देखकर वो पुजारी आश्चर्यचकित होकर उससे बोला बेटी  तुम पर ये कैसा कोप है जो तुम्हारी ऐसी हालत है ” राजकुमारी ने बताया कि मै शिव पूजा की कहानी सुनने नहीं गई थी। इन सब बातों को सुनकर मंदिर के पुजारी जी ने राजकुमारी को शिवजी की पूजा अर्चना के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखने को कहा।वे बोले बेटी इस व्रत को रखने से तुमको लाभ जरूर मिलेगा।

राजकुमारी ने सोलह सोमवार का व्रत किया और 17वे सोमवार पर उनके पति ब्राह्मण पुत्र उसके बारे में सोचने लगे “वो कहा होगी, मुझे उसकी तलाश करनी चाहिये ” ब्राह्मण पुत्र ने अपने सैनिको को भेज कर अपनी पत्नी को ढूंढने के लिए कहा। सैनिक राजकुमारी को ढूढ़ते हुए पुजारी के घर जा पहुंचे। वहा पहुंचकर उनको पता चला कि राजकुमारी पुजारी के यहाँ है। सैनिकों ने पुजारी से कहा कि राजकुमारी को घर ले जाने के लिए आए है। परन्तु पुजारी जी ने मना करते हुए कहा है कि “अपने राजा को कहो कि खुद आकर इसे ले जाए| ” राजा खुद वहा पर आया और राजकुमारी को वापस अपने महल लेकर आया| इस तरह जो भी ये सोलह सोमवार व्रत करता है उसकी सभी मनोकामनाए पुरी होती है|

सोलह सोमवार की विशेष बातें 

श्रावण मास में सबसे लोकप्रिय व्रत 16 सोमवार का है। इस व्रत को अविवाहित महिलाए और लड़कियां करती है। इस व्रत को करने से महिलाओ और लड़कियों को अपना मनचाहा वर या फल मिल जाता है। वैसे यह व्रत हर वर्ग के लोग रख सकते है। लेकिन इस व्रत को रखने के लिए कुछ नियम के चलते वही लोग रखे जो इस व्रत की क्षमता रख सकते है। विवाहित महिलाएं इस व्रत को ब्रह्मचर्य नियमो का ध्यान में रखते हुए पालन करे। आज हम को बताने जा रहे है। इस व्रत के जुडी कुछ महत्वपूर्ण बाते|

  • इस व्रत को करने के लिए आप लोगों को सूर्योदय से पहले उठकर नहाना है। नहाने के पानी में काले तिल के कुछ दानों डालकर फिर नहाइए।
  • व्रत के दौरान भगवान सूर्य को जल में हल्दी मिक्स कर जल अर्पण कीजिए।
  • भगवान भोलेनाथ की उपासना करते समय सबसे पहले आप सभी लोग एक तांबे के पात्र में भगवान शिव की शिवलिंग को रखे।
  • अब सभी लोग अपनी विशेष मनोकामना की पूर्ति करने के लिए भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करे।
  • अभिषेक में उपयोग होने वाली वस्तु, दूध, दही, घी, शहद, चने की दाल, सरसों तेल ,काले तिल और अंतिम में गंगाजल या फिर साधारण जल से अभिषेक करे|
  • अभिषेक करने के बाद आप ‘ॐ नमः शिवाय’ के मंत्र का उच्चारण करते हुए श्वेत फूल, सफेद चंदन, चावल, पंचामृत, सुपारी, फल और गंगाजल या शुद्ध पानी से भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की पूजा अर्चना करना चाहिए।
  • जब भी आप सभी लोग भगवान शिव का अभिषेक कर रहे है आपको पूरे विधि विधानों के साथ मंत्रों का जाप भी जरुरी है।
  • भगवान शिव का महामृत्युंजय मंत्र, पंचाक्षरी मंत्र और अन्य मंत्र आप को जो भी कंठस्थ स्तोत्र हो।
  • भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना करने के बाद सोलह सोमवार की कथा करना चाहिए।
  • पूजा अर्चना होने के बाद आप ने भगवान शिव को जो भी भोग लगाया है। उसको घर के सभी सदस्य को देने के बाद स्वयं भी ग्रहण कर ले।
  • इस व्रत में आप ध्यान रखे कि आप जो भी प्रसाद ले रहे है। उसमें नमक ना हो।
  • सोलह सोमवार के व्रत में आप कभी भी दिन में न सोए।
  • सोलह सोमवार के व्रत में सोमवार के दिन पूजा अर्चना का समय निश्चित रखे।
  • प्रति सोलह सोमवार को आप एक ही समय में एक प्रसाद को ग्रहण करें।
  • सोलह सोमवार की कथा के समय आप जो भी प्रसाद चढ़ा रहे हो उसमें गंगाजल, तुलसी, लौंग, चूरमा, खीर और लड्डू इन सब में से आप अपनी क्षमतानुसार किसी एक ही चयन करें।
  • सोलह सोमवार के व्रत में आप जो भी खाद्य सामग्री ग्रहण करें उसको सोलह दिन तक करे और इतना ही नहीं जिस जगह पर बैठकर खाद्य सामग्री ग्रहण कर रहे है। उसी जगह पर करें और न ही चलते फिरते।
  • सोलह सोमवार के इस व्रत में प्रति सोमवार को एक विवाहित जोड़े को फल, वस्त्र और मिठाई आदि सब का उपहार दे सकते है।
  • सोलह सोमवार के व्रत में सोलह सोमवार तक प्रसाद और पूजा का जो भी समय है। उस समय को निर्धारित करें और उस समय को खंडित न होने दे।

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