Rickets Symptoms: बच्चों में होने वाला सूखा रोग कर देगा हड्डियों को कमजोर

सूखा रोग यानी रिकेट्स, हड्डियों का एक रोग है जो बच्चों में होता है। यह रोग बच्चों के शरीर में विटामिन डी की कमी के चलते होता है।

इसमें बच्चा दिन प्रतिदिन निरबल होता जाता है उसका पेट भी आगे की और निकलने लगता है। साथ ही इसमें बच्चों की हड्डियाँ मुलायम हो जाती हैं।

और कई बच्चो के केसेस मे यह हड्डियां इतनी कमजोर हो जाती हैं कि साधारण दबाव के चलते भी टूटने लगती है। यही कारण है की इस रोग के होने पर बच्चो के पैर टेढ़े मेढ़े हो जाते है और स्पाइन भी असामान्य होकर मुड़ जाती है।

यदि यह रोग बड़ों में होता है तो इसे अस्थि-मृदुता (ओस्टोमलाकिआ) कहा जाता है। विशेषज्ञों के मुताबित यह रोग कुपोषण के चलते होता है, तो चलिए आज के लेख में जानते है रिकेट्स कैसे होता है और Rickets Symptoms in Hindi.

Rickets Symptoms in Hindi: रिकेट्स क्या होता है जाने इसके होने के लक्षण और बचाव

Rickets Symptoms

रिकेट्स के लक्षण

  • रिकेट्स का मुख्य लक्षण हड्डियों में दर्द है।
  • जिन बच्चों को यह समस्या होती है उन्हें बहुत बेचैनी होने लगती है और वे चिड़चिड़े हो जाते है।
  • इसमें बच्चो के सर से अधिक पसीना निकलने लगता है, दस्त लग जाते है और मांसपेशिया ठंडी पढ़ने लगती है। इसी के साथ मांसपेशियां कमजोर होने लगती है।
  • इस के अलावा मांसपेशियों में ऐठन भी आने लगती है।
  • इसके होने पर दाँतों की रचना में विकृति, दाँतों में कैविटी होना और दाँतों में देर से विकास होना सम्मिलित हैं।
  • सूखा रोह होने पर बच्चे की छाती में विकार हो जाते है जिसके कारण ना वो ठीक से चल पाता है और ना उठ बैठ पाता है।
  • इसका एक लक्षण यह भी है की यह शरीर का विकास विलंबित कर देता है।
  • इस समस्या में रीढ़, श्रोणि और पैर में दर्द जैसी समस्या भी होती है।
  • यह हड्डी में फ्रैक्चर जैसे समस्या में भी वृद्धि कर देता है।
  • इस समस्या से बच्चों का अपनी उम्र के बच्चों के मुकाबले कद छोटा रह जाता है।
  • इस बीमारी का एक लक्षण है कंकाल विकृति का होना। इसमें पैरों का टेढ़ा होना, रीढ़ की हड्डी का टेढ़ा होना, छाती की छड्डियों का बाहर आना।
  • यह समस्या होने पर बच्चों में हड्डियों के टूटने का डर रहता है।

कैसे होता है रिकेट्स?

  • शरीर में विटामिन डी, हड्डियों में कैल्शियम और फास्फोरस को अवशोषित करने का कार्य करता है। इसका मतलब है यदि विटामिन डी की कमी हो जाएगी तो शरीर में विटामिन सी और फॉस्फोरस की कमी भी हो जाती है।
  • ऐसी अवस्था में जब शरीर के रक्त में कैल्शियम और फास्फोरस की कमी होने लगती है तो रक्त इसकी पूर्ति हड्डियों से करने लगता है और अपना संतुलन बनाता है। इसके परिणामस्वरूप हड्डियां मुलायम होने लगती है और हड्डियों की संरचना कमजोर हो जाती है।
  • विटामिन डी की कमी से रिकेट्स होता है, इसका खतरा 3 से 36 महीने तक के बच्चों में ज्यादा देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त जिनकी त्वचा का रंग काला होता है उन्हें भी रिकेट्स का खतरा बना रहता है क्योंकि इस तरह की त्वचा पर धूप का प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

सामान्य कारण (Rickets Causes)

  • हम जानते है विटामिन डी का मुख्य स्त्रोत सूर्य का प्रकाश होता है। आजकल के बच्चे बाहर ज्यादा खेलना पसंद नहीं करते है, जिसके चलते उन्हें पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी नहीं मिल पाता है।
  • बच्चों को पौष्टिक खाना ना मिल पाने के कारण भी विटामिन डी कमी हो जाती है और रिकेट्स का खतरा बढ़ जाता है।
  • बहुत कम केसेज में इसके पीछे अनुवांशिक कारण भी हो सकते है।
  • अगर व्यक्ति सीलिएक रोग से ग्रसित हो तो भी उसे इस समस्या से गुजरना पड़ता है।
  • अगर हमेशा ही पेट दर्द बना रहे। यह भी इसका एक कारण है।
  • अगर बच्चे को सिस्टिक फाइब्रोसिस की समस्या है तो रिकेट्स होने का खतरा भी बना रहता है।
  • अगर गुर्दो से संबंधित कोई समस्या है तो यह रिकेट्स के होने का कारण बन सकती है।

अन्य कारण

  • बच्चों की सांवली त्वचा होना भी इसका के कारण होता है।
  • बच्चों का निर्धारित समय के पहले ही जन्म होना।
  • गर्भावस्था के दौरान माँ के शरीर में विटामिन डी की कमी का होना। इस वजह से बच्चों को विटामिन डी की कमी से यह समस्या हो जा सकती है।

रिकेट्स के उपचाप हेतु करे ये दो काम

  • कैल्शियम और विटामिन डी का पर्याप्त मात्रा में सेवन करे।
  • जल्द ही डॉक्टर से संपर्क करे और जरूरी जांच करवाइये।
  • इस रोग का इलाज करने हेतु पहले इसके कारण को जानना चाहिए।
  • अगर यह बीमारी संपूर्ण आहार की कमी के कारण हुई है तो मरीज को विटामिन डी युक्त भोजन क साथ साथ कैल्शियम युक्त भोजन भी दे।  इसके अलावा चाहे तो मरीज को साल में एक बार विटामिन डी के लगने वाले इंजेक्शन भी लगवाए।
  • अगर यह बीमारी अनुवांशिक कारण से हुई है तो डॉक्टर्स फॉस्फोरस, कैल्शियम और एक्टिव विटामिन डी हॉर्मोन वाली दवाइयां देते है।
  • अगर रिकेट्स किसी और बीमारी के होने से हुआ है तो उन बीमारियों का सही समय पर और सही तरीके से इलाज करवाना जरूरी है।
  • इसके उपचार के लिए मरीज़ को थोड़ी देर के लिए धुप में रहना चाहिए।
  • अगर यह सूखा रोग किसी मेटाबोलिज्म संबंधित समस्या से हुआ है तो डॉक्टर मरीज के लिए विटामिन डी के सप्लीमेंट्स देता है।
  • अगर हड्डियों का शेप प्रॉपर नहीं है तो हड्डियों को ब्रेसिंग और सर्जरी करके फिर से शेप में लाया जाता है।

महत्वपूर्ण जांच ज़रूर करवाए

  • ब्लड टेस्ट – ब्लड टेस्ट करवाने से शरीर में कैल्शियम और फास्फोरस का पता लगाया जा सकता है। इससे शरीर में एल्कलाइन फॉस्फेट लेवल का भी पता चलता है।
  • आर्टेरिअल ब्लड गैसेज – इस जांच को करवाने से यह पता चलता है की ब्लड कितना एसिडिक है।
  • एक्स रे – इस जाँच को करवाने से यह पता चलता है की हड्डियों में कैल्शियम है की नहीं और साथ ही हड्डियों का शेप प्रॉपर है की नहीं।
  • बॉन बायोप्सी – यह एक सटीक जाँच है जो यह बताती है की रिकेट्स की समस्या है की नहीं लेकिन इसे कम ही लोग करवाते है।

इस ऊपर दिए लेख में आज हमने आपको बताया की रिकेट्स की समस्या में क्या उपचार होते है और साथ ही इसके लक्षण क्या क्या है। अगर किसी को यह बीमारी है तो लक्षणों को समय पर पहचाने और जल्द ही डॉक्टर से संपर्क करके सही Rickets Treatment दिलवाये।


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