Kids Ear Piercing: जानिए बच्चों के कान छिदवाने से सबंधित जानकारी

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हमारे देश में हर चीज की एक परंपरा है, जिसमे से एक है कर्ण छेदन, अर्थात कान को छेदने की प्रथा। बच्चों के कान को छेदने की यह प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है।

कुछ लोगो का मानना होता है की कर्ण पालि एक महत्वपूर्ण एक्यूपंचर बिंदु है। इसलिए कान को छिदवाने का उपचारात्मक महत्त्व भी हो सकता है। कहा जाता है की कान के मध्य की सबसे खास स्थान पर जब प्रेशर लगाया जाता है तो इसके बीच की सभी नसें एक्‍टिव हो जाती हैं।

कुछ लोग परंपरा के कारण और कुछ लोग फैशन के कारण कान को छिदवाते है। साथ ही कुछ रिवाज़ों में तो छोटे लड़कों के भी कान को छिदवा दिया जाता है।

कान को छेदने की परंपरा होने के साथ साथ ही इसके कई स्वास्थवर्धक लाभ भी होते है। जैसे की इससे आँखों की रौशनी तेज होती है, दिमाग विकसित होता है, तनाव दूर होता है आदि। जानते है Kids Ear Piercing के बारे में विस्तार से।

Kids Ear Piercing – बच्चों में कान छेदने की आयु व बाली का चयन

Kids Ear Piercing

शिशु के कान छिदवाने की आयु

  • कान के छिदवाने की आयु अपने अपने आस्था और रीति-रिवाज़ों पर निर्भर करती है।
  • परन्तु परंपरागत रूप से, शिशु के कान पहले या तीसरे साल में छिदवाए जाते हैं।
  • आपको बता दे की कुछ क्षेत्रों में माता-पिता मुंडन समारोह तक इसकी प्रतीक्षा करते हैं।
  • साथ ही देश के कुछ भागों में, शिशु के कान बारसे यानि नामकरण के दिन छिदवाए जाते हैं, अर्थात शिशुजन्म के 12वें या 13वें दिन।

किससे छिदवाने चाहिए कान?

  • परंपरा के अनुसार कान को छिदवाने के लिए सड़को पर बैठे कान छेदने वालो से या फिर किसी सुनार से कान को छिदवाया जाता है।
  • किंतु बच्चों के कान ऐसी जगह से छिदवाने चाहिए जहाँ पर कान को छेदने के लिए प्रयोग किये जाने वाले उपकरण रोगाणुरहित हो और किसी कुशल प्रशिक्षक से ही यह कार्य करवाना चाहिए।
  • आजकल कई लोग अपने बच्चों के कान डॉक्टरों से भी छिदवाने लगे है।

किस प्रकार करे बुंदे या बाली का का चयन

  • बच्चों के कान को छिदवाने के लिए छोटे बुँदे या फिर बाली का चयन कर सकते है। पर इसके लिए ध्यान रखे की ये ज्यादा छोटे नहीं होने चाहिए ज्यादा छोटे होने से यह समस्या उत्पन्न कर सकते है।
  • साथ ही यह भी ध्यान रखे की बुँदे या फिर बाली सर्जिकल स्टील या सोने से बने हों ।
  • आपको बता दे की पारंपरिक रूप से, एक नीम की तिल्ली छिदे हुए कानों में डाली जाती है। क्योंकि यह उपचारात्मक और रोगाणुनाशक गुणों वाली होती है।

किस तरह से छिदवाने चाहिए कान

  • आप जब भी कान को छिदवाए इस बात का ज़रूर ध्यान रखे की वह उपकरण संक्रमण रहित हो ताकि बच्चे को संक्रमण से दूर रखा जा सके।
  • बता दे की कानों को कर्ण पालि के केंद्र में छेदा जाता है। जो की एक अनुभवी व्यक्ति इसे आसानी से कर सकता है उसे किसी मार्क की या पेन से निशान बनाए की आवश्यकता नहीं होती है।
  • कभी कभी पेन या मार्कर से कान पर निशान बनाने से भी उस स्थान पर जलन होने लगती है। इसलिए इससे बच्चे को जितना दूर रख सके उतना अच्छा होता है।
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